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Life process #1900

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कक्षा X - विज्ञान (CLASS X - SCIENCE)

अध्याय: जैव प्रक्रम (LIFE PROCESSES)

COMPLETE ONE-SHOT NOTES (HINDI MEDIUM)


जैव प्रक्रम (LIFE PROCESSES)

किसी जीव द्वारा अपने जीवन को बनाए रखने और जीवित रहने के लिए की जाने वाली बुनियादी और आवश्यक गतिविधियाँ जैव प्रक्रम कहलाती हैं।

मुख्य जैव प्रक्रम निम्नलिखित हैं:

  • पोषण (Nutrition)
  • श्वसन (Respiration)
  • वहन / परिवहन (Transportation)
  • उत्सर्जन (Excretion)
"जैव प्रक्रम का सीधा नियम: खाओ, सांस लो, मलमूत्र त्यागो, और इसी को दोहराओ—बिल्कुल हमारे एक सामान्य दिन की तरह।"

पोषण (NUTRITION)

वह प्रक्रम जिसके द्वारा कोई जीवित जीव भोजन प्राप्त करता है और उसका उपयोग करता है, पोषण कहलाता है।

  • भोजन हमारे शरीर को ऊर्जा, वृद्धि और ऊतकों के मरम्मत की क्षमता देता है।

भोजन के मुख्य घटक (COMPONENTS OF FOOD):

  • कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)
  • प्रोटीन (Proteins)
  • वसा (Fats)
  • विटामिन और खनिज (Vitamin & Minerals)
  • संतुलित आहार योजना (Diet Plan)

पोषण के प्रकार (TYPES OF NUTRITION)

1. स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)

यह पोषण का वह तरीका है जिसमें जीव सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) और जल जैसे सरल अकार्बनिक पदार्थों का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं।

  • उदाहरण: हरे पौधे, शैवाल और नील-हरित जीवाणु।

  • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): स्वपोषी पोषण का वह प्रकार जिसमें जीव सौर/प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं। (उदाहरण: पौधे)

  • रसायन संश्लेषण (Chemosynthesis): स्वपोषी पोषण का वह प्रकार जिसमें जीव रासायनिक ऊर्जा का उपयोग करके अपना भोजन तैयार करते हैं। (उदाहरण: बैंगनी गंधक जीवाणु - Purple sulfur bacteria)

2. विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)

यह पोषण का वह तरीका है जिसमें जीव अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों (पौधों या जानवरों) पर निर्भर रहते हैं क्योंकि वे अपना भोजन स्वयं संश्लेषित नहीं कर सकते।

  • उदाहरण: मनुष्य और सभी जानवर।

विषमपोषी पोषण के विभिन्न प्रकार

  • प्राणीसम / पूर्णभोजी पोषण (Holozoic): इस पोषण में जीव ठोस या तरल जटिल भोजन को शरीर के अंदर ग्रहण (Ingest) करते हैं, जहाँ उसका पाचन होता है।
    • उदाहरण: अमीबा, मानव, कुत्ता, शेर।
  • मृतोपजीवी पोषण (Saprophytic): इसमें जीव अपना भोजन मृत और सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों से शरीर के बाहर ही गलाकर अवशोषित करते हैं।
    • उदाहरण: कवक (Fungi), मशरूम, ब्रेड मोल्ड।
  • परजीवी पोषण (Parasitic): इसमें जीव किसी अन्य जीवित जीव (जिसे मेजबान या होस्ट कहते हैं) के शरीर के अंदर या बाहर रहकर, बिना उसे जान से मारे, उससे अपना पोषण लगातार प्राप्त करते हैं।
    • उदाहरण: अमरबेल (Cuscuta), जू (Lice), किलनी (Ticks), जोंक (Leech)।

बोर्ड परीक्षा प्रश्न (2017, 2020, 2021)

प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन सा जीव मृतोपजीवी पोषण प्रदर्शित करता है?
(a) आम का पेड़ (b) अमीबा (c) मशरूम (d) पैरामिसियम
उत्तर: (c) मशरूम
बोर्ड परीक्षा प्रश्न (CBSE 2019, 2021, 2023, 2025)

प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन सा जीव पोषण का परजीवी तरीका दिखाता है?
(a) अमीबा (b) शैवाल (c) मशरूम (d) अमरबेल (Cuscuta)
उत्तर: (d) अमरबेल (Cuscuta)
उच्च स्तरीय MCQ (CBSE 2023, 2024, 2025)

प्रश्न: एक ऐसे जीव की खोज की गई जिसमें क्लोरोफिल नहीं है और वह अन्य जीवित जीव के ऊतकों में प्रवेश करके पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। वह मेजबान को न तो मारता है और न ही सड़ता है। यह केवल एक विशेष पौधे को संक्रमित करता है। निम्नलिखित में से कौन सा इसके पोषण का सबसे अच्छा वर्णन है?
(a) मृतोपजीवी पोषण (b) प्राणीसम पोषण (c) परजीवी स्वपोषी पोषण (d) अविकल्पी परजीवी विषमपोषी पोषण
उत्तर: (d) अविकल्पी परजीवी विषमपोषी पोषण (Obligate parasitic heterotrophic nutrition)

प्रकाश संश्लेषण (PHOTOSYNTHESIS)

संतुलित रासायनिक समीकरण:

$$6CO_{2} + 12H_{2}O \xrightarrow{\text{सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल}} C_{6}H_{12}O_{6} (\text{ग्लूकोज}) + 6O_{2} + 6H_{2}O$$

  • आवश्यक कच्ची सामग्री: सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल, कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) और जल ($H_{2}O$)।
  • प्रकाश संश्लेषण का स्थल: क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक), जो पत्तियों की कोशिकाओं में पाए जाने वाले हरे रंग के कोशिकांग हैं जिनमें क्लोरोफिल वर्णक होता है।
  • भोजन का संग्रहण: पौधे तैयार ग्लूकोज को भविष्य के लिए "स्टार्च" (मंड़) के रूप में संचित करते हैं, जबकि मनुष्य अतिरिक्त ग्लूकोज को "ग्लाइकोजन" के रूप में लीवर और मांसपेशियों में संचित करते हैं।

प्रकाश संश्लेषण के दौरान होने वाली मुख्य घटनाएँ:

  1. क्लोरोफिल द्वारा सौर/प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करना।
  2. प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण होना तथा जल के अणुओं का हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अपघटन (टूटना)
  3. कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) का कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) में अपचयन (Reduction) होना।

रंध्र और उनके कार्य (STOMATA)

पत्तियों की सतह पर मौजूद अत्यंत सूक्ष्म छिद्रों को रंध्र (Stomata) कहते हैं।

रंध्रों के दो मुख्य कार्य:

  1. प्रकाश संश्लेषण और श्वसन के लिए वायुमंडल से गैसों का विनिमय (आदान-प्रदान) करना ($O_{2}/CO_{2}$)।
  2. वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पौधों से अतिरिक्त जल का जल-वाष्प के रूप में बाहर निकलना, जो पौधे के तापमान को भी नियंत्रित रखता है।

रंध्रों का खुलना और बंद होना (नियमन):

  • यह पूरी प्रक्रिया द्वार कोशिकाओं (Guard cells) के सूजने (स्फीत होने) या सिकुड़ने (श्लथ होने) पर निर्भर करती है।
  • जब पानी आस-पास की कोशिकाओं से द्वार कोशिकाओं के अंदर जाता है $\rightarrow$ द्वार कोशिकाएं फूल जाती हैं $\rightarrow$ रंध्र का छिद्र खुल जाता है।
  • जब द्वार कोशिकाओं से पानी बाहर निकल जाता है $\rightarrow$ वे सिकुड़ जाती हैं $\rightarrow$ रंध्र का छिद्र बंद हो जाता है।

मरुस्थलीय (Registan) पौधों में प्रकाश संश्लेषण की विशेष रणनीति:

  • मरुस्थलीय पौधे दिन की भीषण गर्मी में पानी बचाने के लिए अपने रंध्र दिन में बंद रखते हैं।
  • उनके रंध्र रात में खुलते हैं – वे रात में $CO_{2}$ ग्रहण करके एक मध्यवर्ती उत्पाद (Malic acid) बना लेते हैं।
  • दिन में जब सूर्य का प्रकाश उपलब्ध होता है, तब क्लोरोफिल उस मध्यवर्ती उत्पाद पर काम करके प्रकाश संश्लेषण पूरा करता है।

परीक्षा प्रश्न (2019, 2021, 2024)

प्रश्न: हरी पत्ती के खुले रंध्र की स्थिति के लिए निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(a) द्वार कोशिकाओं में बड़ी मात्रा में पानी बहता है। (b) गैसीय विनिमय बहुत अधिक रुक जाता है। (c) द्वार कोशिकाओं से पानी बाहर निकलता है। (d) शर्करा एकत्र होती है।
उत्तर: (a) द्वार कोशिकाओं में बड़ी मात्रा में पानी बहता है (जिससे वे फूल जाती हैं और रंध्र खुलता है)।
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (2018, 2020, 2022, 2024)

प्रश्न: रंध्र क्या हैं? ये पौधे में कहाँ स्थित होते हैं? इनके दो मुख्य कार्य लिखिए और समझाइए कि इनका खुलना और बंद होना कैसे नियंत्रित होता है।
उत्तर: रंध्र पत्तियों के बाह्यत्वचा (Epidermis) पर स्थित छोटे छिद्र हैं। इसके कार्य गैस विनिमय और वाष्पोत्सर्जन हैं। इसका नियंत्रण द्वार कोशिकाओं द्वारा होता है; पानी अंदर आने पर वे टर्जिड (Turgid) होकर रंध्र खोलती हैं और पानी बाहर जाने पर फ्लैसिड (Flaccid) होकर रंध्र बंद करती हैं।

🧪 प्रयोग आधारित प्रश्न (KOH Experiment)

महत्वपूर्ण प्रयोगात्मक PYQ (2020, 2022, 2023, 2024)

प्रश्न: एक छात्र यह दिखाने के लिए प्रयोग करता है कि प्रकाश संश्लेषण के लिए $CO_{2}$ आवश्यक है। वह बेल जार के अंदर पोटेशियम हाइड्रोक्साइड (KOH) की प्लेट रखता है।
(a) इस प्रयोग में KOH की क्या भूमिका है?
(b) उपकरण सेट करने के बाद पौधे को धूप में क्यों रखा जाता है?
(c) कौन सा परिणाम इसकी पुष्टि करेगा?
उत्तर:
(a) KOH बेल जार के भीतर की हवा से सारी कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) को सोख लेता है, जिससे अंदर $CO_{2}$-मुक्त माहौल बनता है।
(b) ताकि पौधे को $CO_{2}$ के अलावा अन्य सभी आवश्यक कारक (प्रकाश, जल) मिल सकें और अंतर स्पष्ट हो सके।
(c) जब जार के अंदर की पत्ती का आयोडीन से स्टार्च टेस्ट किया जाता है, तो वह नीली-काली नहीं होती। इससे साबित होता है कि $CO_{2}$ के बिना स्टार्च नहीं बना, यानी प्रकाश संश्लेषण के लिए $CO_{2}$ अनिवार्य है।

अमीबा और पैरामिसियम में पोषण

अमीबा में पोषण (Nutrition in Amoeba):

अमीबा एक कोशिकीय जीव है जिसमें प्राणीसम (Holozoic) पोषण होता है। इसकी प्रक्रिया 5 चरणों में होती है:

  1. अंतर्ग्रहण (Ingestion): जब भोजन अमीबा के पास आता है, तो वह अपनी उंगली जैसे अस्थायी प्रवर्ध कूटपाद (Pseudopodia) की मदद से उसे घेर लेता है और एक खाद्य रिक्तिका (Food Vacuole) बना लेता है।
  2. पाचन (Digestion): खाद्य रिक्तिका के अंदर पाचक एंजाइम प्रवेश करते हैं और जटिल भोजन को सरल अणुओं में तोड़ते हैं।
  3. अवशोषण (Absorption): पचा हुआ भोजन सीधे कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में विसरित होकर सोख लिया जाता है।
  4. स्वांगीकरण (Assimilation): अवशोषित भोजन का उपयोग अमीबा अपनी ऊर्जा, वृद्धि और विभाजन के लिए करता है।
  5. बहिःक्षेपण (Egestion): अपचा हुआ अपशिष्ट पदार्थ कोशिका की सतह की ओर जाता है और त्वचा फटने से बाहर निकाल दिया जाता है।

पैरामिसियम में पोषण (Nutrition in Paramecium):

  • यह भी एक कोशिकीय प्राणीसम जीव है, लेकिन इसका आकार निश्चित होता है।
  • यह भोजन को एक निश्चित स्थान (Oral Groove/मुख खांच) से ही ग्रहण कर सकता है। भोजन को इस स्थान तक पहुँचाने के लिए इसकी पूरी सतह पर पाए जाने वाले बालों जैसे सीलिया (Cilia/रोमाभ) की लगातार लयबद्ध गति का उपयोग किया जाता है।

मानव पाचन तंत्र (HUMAN DIGESTIVE SYSTEM)

मानव पाचन तंत्र आहार नाल (Alimentary Canal - मुख से गुदा तक फैली नली) और पाचक ग्रंथियों से मिलकर बना है।

1. मुख (Mouth):

  • दांत भोजन को चबाकर छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं।
  • लार ग्रंथियां लार रस (Saliva) स्रावित करती हैं। लार में लार एमाइलेज (Salivary Amylase) एंजाइम होता है, जो जटिल स्टार्च को मीठी शर्करा (Maltose) में बदल देता है।
  • जीभ भोजन को लार के साथ मिलाने और निगलने का कार्य करती है।

2. ग्रसिका / भोजन नली (Oesophagus):

  • मुख से आमाशय तक भोजन ले जाने वाली नली है। इसमें कोई पाचन नहीं होता।
  • भोजन इसकी पेशीय दीवारों के संकुचन और शिथिलन की गति से नीचे जाता है, जिसे क्रमाकुंचन गति (Peristaltic movement) कहते हैं।

3. आमाशय (Stomach):

यह एक बड़ा पेशीय थैला है। इसकी दीवारों में जठर ग्रंथियां होती हैं जो जठर रस (Gastric Juice) निकालती हैं। इसमें तीन घटक होते हैं:

  • हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl): यह माध्यम को अम्लीय बनाता है जो पेप्सिन एंजाइम के काम करने के लिए जरूरी है, साथ ही भोजन के साथ आए हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
  • पेप्सिन (Pepsin): यह अम्लीय माध्यम में भोजन के प्रोटीन का पाचन शुरू करता है।
  • श्लेष्मा (Mucus): यह आमाशय की आंतरिक दीवार की हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) के संक्षारक प्रभाव से रक्षा करता है।

क्षुद्रांत्र (SMALL INTESTINE) - पूर्ण पाचन का स्थल

यह आहार नाल का सबसे लंबा भाग (लगभग 6 से 7 मीटर लंबा और अत्यधिक कुंडलित) है। यहाँ भोजन का पूर्ण पाचन और अवशोषण होता है। इसमें दो प्रमुख अंगों से पाचक रस आकर मिलते हैं:

(A) यकृत (Liver) से मिलने वाला रस:

  • यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जो पित्त रस (Bile Juice) बनाती है (यह पित्ताशय में संचित रहता है)।
  • कार्य: 1. यह आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाता है ताकि अग्न्याशयी एंजाइम काम कर सकें।
    2. वसा का इमल्सीकरण (Emulsification): यह वसा की बड़ी-बड़ी बूंदों को छोटी बूंदों में तोड़ता है ताकि उन पर एंजाइम आसानी से क्रिया कर सकें।

(B) अग्न्याशय (Pancreas) से मिलने वाला रस:

अग्न्याशयी रस में मुख्य रूप से ये एंजाइम होते हैं:

  • ट्रिप्सिन (Trypsin): यह प्रोटीन को और सरल रूपों (पेप्टाइड्स) में पचाता है।
  • लाइपेज (Lipase): यह इमल्सीकृत वसा को वसा अम्ल में तोड़ता है।
  • अग्न्याशयी एमाइलेज: बचे हुए कार्बोहाइड्रेट का पाचन करता है।

(C) आंत्र रस (Intestinal Juice):

अंत में, छोटी आंत की दीवारों से निकलने वाला आंत्र रस सभी घटकों को उनके सबसे सरलतम रूप में बदल देता है:

  • प्रोटीन $\rightarrow$ अमीनो अम्ल (Amino Acids) में बदल जाता है।
  • जटिल कार्बोहाइड्रेट $\rightarrow$ ग्लूकोज (Glucose) में बदल जाता है।
  • वसा $\rightarrow$ वसा अम्ल (Fatty Acids) और ग्लिसरॉल में बदल जाता है।

भोजन का अवशोषण और दीर्घरोम (Villi):

  • छोटी आंत की आंतरिक सतह पर उंगली जैसे लाखों छोटे-छोटे प्रवर्ध होते हैं जिन्हें दीर्घरोम या विली (Villi) कहते हैं।
  • ये अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल को बहुत बढ़ा देते हैं। इनमें रुधिर वाहिकाओं (Blood vessels) का घना जाल होता है, जो पचे हुए भोजन को सोखकर शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाती हैं।

वृहदांत्र (LARGE INTESTINE):

  • बिना पचा हुआ भोजन यहाँ भेजा जाता है, जहाँ इसकी दीवारें अपशिष्ट में से अतिरिक्त जल का अवशोषण कर लेती हैं।
  • शेष बचा ठोस अपशिष्ट पदार्थ गुदा (Anus) के रास्ते शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है, जिसका नियंत्रण गुदा अवरोधिनी (Anal Sphincter) पेशी करती है।

विशेष नोट: शाकाहारी जंतुओं (जैसे गाय, हिरण) की छोटी आंत लंबी होती है क्योंकि उन्हें घास का सेल्युलोज पचाना पड़ता है जिसे टूटने में लंबा समय लगता है। मांस खाने वाले मांसाहारी जंतुओं (जैसे शेर) की छोटी आंत छोटी होती है क्योंकि मांस आसानी से पच जाता है।


पाचन तंत्र से संबंधित PYQs (2018 से 2025)

प्रश्न 1: हमारे पाचन तंत्र में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पित्त रस के कार्य लिखिए।
उत्तर: HCl माध्यम को अम्लीय बनाता है, पेप्सिन को सक्रिय करता है और रोगाणुओं को मारता है। पित्त रस माध्यम को क्षारीय बनाता है और वसा का इमल्सीकरण (छोटी बूंदों में तोड़ना) करता है।

प्रश्न 2: विली (दीर्घरोम) क्या हैं? इनका क्या महत्व है?
उत्तर: विली छोटी आंत के अस्तर पर उंगली जैसे प्रवर्ध हैं। ये पचे भोजन के अवशोषण के लिए सतही क्षेत्र बढ़ाते हैं और पोषक तत्वों को सीधे रक्त में भेजते हैं।

श्वसन (RESPIRATION)

सांस लेना (Breathing) बनाम कोशिकीय श्वसन (Respiration) में अंतर:

सांस लेना (Breathing) कोशिकीय श्वसन (Respiration)
यह केवल एक भौतिक प्रक्रम है जिसमें जीव वातावरण से $O_{2}$ लेता है और $CO_{2}$ छोड़ता है। यह एक जटिल जैव-रासायनिक प्रक्रम है जिसमें कोशिका के अंदर ग्लूकोज का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा बनाई जाती है।
इसमें कोई एंजाइम भाग नहीं लेते। इसमें अनेक कोशिकीय एंजाइम शामिल होते हैं।
यह कोशिकाओं के बाहर अंगों (जैसे फेफड़े) में होता है। यह शरीर की प्रत्येक कोशिका के भीतर होता है।
इसमें ऊर्जा मुक्त नहीं होती बल्कि ऊर्जा खर्च होती है। इसमें भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है जो ATP अणुओं के रूप में संचित होती है।

ग्लूकोज के विखंडन के विभिन्न पथ (Most Important)

कोशिका के भीतर सबसे पहले कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में 6-कार्बन वाला ग्लूकोज अणु, 3-कार्बन वाले पायरुवेट अणु और थोड़ी ऊर्जा में टूटता है। इसके बाद इसके विखंडन के तीन अलग-अलग पथ हैं:

  1. ऑक्सीजन की उपस्थिति में (वायवीय श्वसन - Aerobic Respiration): यह प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया में होती है। पायरुवेट पूरी तरह से टूटकर कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$), जल ($H_{2}O$) और अत्यधिक ऊर्जा (38 ATP) बनाता है। (उदाहरण: मनुष्य, अधिकांश जीव)।
  2. ऑक्सीजन के अभाव/कमी में (हमारी पेशी कोशिकाओं में): जब हम बहुत तेज दौड़ते या भारी कसरत करते हैं, तो मांसपेशियों में ऑक्सीजन की अस्थायी कमी हो जाती है। तब पायरुवेट लैक्टिक अम्ल और ऊर्जा (2 ATP) में बदल जाता है। मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल जमा होने से क्रैम्प (दर्दनाक ऐंठन) पैदा होती है।
  3. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में (अवायवीय श्वसन - Anaerobic Respiration): यह प्रक्रिया ईस्ट (Yeast) जैसी कोशिकाओं में किण्वन (Fermentation) के दौरान होती है। यहाँ पायरुवेट बिना ऑक्सीजन के टूटकर इथेनॉल (अल्कोहल), $CO_{2}$ और बहुत कम ऊर्जा (2 ATP) बनाता है।

मानव श्वसन तंत्र और गैस विनिमय

  • नासाद्वार (Nostril): हवा इसी रास्ते से शरीर में प्रवेश करती है। नासा मार्ग में मौजूद महीन बाल और चिपचिपी श्लेष्मा (Mucus) हवा के साथ आने वाले धूल-कणों को रोककर हवा को साफ करते हैं।
  • श्वास नली (Trachea): यह गले से होकर फेफड़ों तक जाती है। श्वास नली के चारों ओर उपास्थि के वलय (Rings of Cartilage) पाए जाते हैं। ये वलय श्वास नली को पिचकने (Collapse होने) से बचाते हैं जब उसमें हवा कम होती है।
  • कूपिका (Alveoli): फेफड़ों के अंदर श्वसन नलिकाएं अंत में गुब्बारे जैसी लाखों छोटी संरचनाओं में समाप्त होती हैं जिन्हें कूपिका कहते हैं। इनकी दीवारें बहुत पतली होती हैं और इनके चारों ओर रुधिर कोशिकाओं (Blood capillaries) का घना जाल होता है। यह फेफड़ों में गैसों के विनिमय ($O_{2}$ रुधिर में जाना और $CO_{2}$ बाहर आना) का मुख्य वास्तविक स्थल है।

श्वसन वर्णक - हीमोग्लोबिन:

  • मानव शरीर का आकार बहुत बड़ा है, इसलिए केवल साधारण विसरण (Diffusion) द्वारा फेफड़ों से पैर के अंगूठे तक ऑक्सीजन नहीं पहुँचाई जा सकती (विसरण से इसमें सालों लग जाएंगे)।
  • इसलिए हमारे रक्त की लाल रुधिर कणिकाओं (RBC) में हीमोग्लोबिन नाम का श्वसन वर्णक होता है। इसकी ऑक्सीजन के लिए बहुत तीव्र बंधुता (Affinity) होती है। यह फेफड़ों से ऑक्सीजन को तेजी से बांधकर पूरे शरीर के सभी ऊतकों तक पहुँचाता है।

श्वसन से संबंधित PYQs

प्रश्न 1: कसरत के बाद हमारी मांसपेशियों में ऐंठन और दर्द (Cramps) क्यों होता है?
उत्तर: ऑक्सीजन की कमी के कारण पायरुवेट मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है। इस लैक्टिक अम्ल के संचय से ऐंठन होती है।

प्रश्न 2: गले में उपास्थि के वलय (Rings of cartilage) का क्या कार्य है?
उत्तर: यह श्वास नली को सहारा देते हैं ताकि हवा न होने पर भी वायु मार्ग पिचके नहीं और सांस सुचारू रूप से चलती रहे।

मानव में वहन / परिसंचरण तंत्र

मनुष्यों में परिसंचरण तंत्र मुख्य रूप से तीन भागों से मिलकर बना है: रक्त, रक्त वाहिकाएं और हृदय

🩸 रक्त के विभिन्न घटक (COMPONENTS OF BLOOD):

  • प्लाज्मा (Plasma): यह रक्त का तरल भाग है जो हल्के पीले रंग का होता है। यह पचे हुए भोजन, $CO_{2}$ और नाइट्रोजनयुक्त उत्सर्जी अपशिष्टों का घुले हुए रूप में वहन करता है।
  • लाल रक्त कोशिकाएं (RBC): इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन को पूरे शरीर में ले जाता है।
  • श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBC): ये हमारे शरीर के सैनिक हैं जो बाहर से आने वाले जीवाणुओं और रोगाणुओं को मारकर हमें बीमार होने से बचाते हैं (प्रतिरक्षा)।
  • प्लेटलेट्स (Platelets): चोट लगने पर यह कोशिकाएं चोट के स्थान पर रक्त का थक्का (Blood Clotting) जमा देती हैं, जिससे शरीर से खून का बहना रुक जाता है।

रक्त वाहिकाएं: धमनी बनाम शिरा

विशेषता धमनी (Arteries) शिरा (Veins)
रुधिर प्रवाह की दिशा यह शुद्ध ऑक्सीजनित रुधिर को हृदय से दूर शरीर के सभी अंगों और ऊतकों तक ले जाती हैं। यह विभिन्न अंगों से अशुद्ध विऑक्सीजनित रुधिर को वापस हृदय तक लाती हैं।
अपवाद फुफ्फुस धमनी (Pulmonary Artery) एकमात्र धमनी है जो अशुद्ध रक्त ले जाती है। फुफ्फुस शिरा (Pulmonary Vein) एकमात्र शिरा है जो शुद्ध रक्त ले जाती है।
दीवार की मोटाई इनकी दीवारें मोटी और अत्यधिक लचीली होती हैं क्योंकि इसमें रक्त हृदय के झटके के कारण उच्च दाब (High Pressure) पर बहता है। इनकी दीवारें पतली और कम लचीली होती हैं क्योंकि इनमें रक्त का दाब बहुत कम होता है।
वॉल्व (Valves) इनमें कोई अंदरूनी वॉल्व नहीं होते। इनमें वॉल्व (Valves) पाए जाते हैं ताकि रक्त केवल एक ही दिशा में (हृदय की ओर) बहे और पीछे की ओर न लौटे।

मानव हृदय की संरचना और दोहरा परिसंचरण

मानव हृदय एक पेशीय पंपिंग अंग है जो मुट्ठी के आकार का होता है। इसमें शुद्ध (ऑक्सीजनयुक्त) और अशुद्ध (ऑक्सीजन-रहित) रक्त को आपस में मिलने से रोकने के लिए चार कोष्ठक (Chambers) होते हैं:

  • ऊपरी दो कोष्ठक: बायाँ अलिंद (Left Atrium) और दायाँ अलिंद (Right Atrium) - ये पतली दीवार वाले होते हैं।
  • निचले दो कोष्ठक: बायाँ निलय (Left Ventricle) और दायाँ निलय (Right Ventricle) - इनकी दीवारें बहुत मोटी और पेशीय होती हैं क्योंकि इन्हें रक्त को पूरे शरीर में दूर तक पंप करना होता है।

दोहरा परिसंचरण (Double Circulation):

मनुष्यों में रक्त एक पूरे चक्र में हृदय से दो बार होकर गुजरता है, इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं:

  1. फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): अशुद्ध रक्त हृदय के दाएं भाग से फेफड़ों में जाता है, वहाँ ऑक्सीजन लेकर शुद्ध होता है और वापस हृदय के बाएं भाग में आता है।
  2. दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation): शुद्ध रक्त हृदय के बाएं भाग से महाधमनी द्वारा पूरे शरीर के अंगों में भेजा जाता है और वहाँ से अशुद्ध होकर महाशिरा द्वारा वापस हृदय के दाएं भाग में आता है।

विभिन्न जंतुओं में हृदय के कोष्ठक:

  • मछलियाँ: केवल 2 कोष्ठक होते हैं। इनका रक्त सीधे गलफड़ों से शुद्ध होकर शरीर में चला जाता है (एकल परिसंचरण)। ये असमतापी (Cold-blooded) होती हैं।
  • उभयचर और सरीसृप (मेंढक, छिपकली): इनमें 3 कोष्ठक होते हैं। ये अपने शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलते हैं, इसलिए थोड़ा बहुत शुद्ध-अशुद्ध रक्त का मिलना सहन कर सकते हैं।
  • पक्षी और स्तनधारी (मनुष्य): इनमें 4 कोष्ठक होते हैं। इन्हें अपने शरीर का तापमान हमेशा नियत (जैसे इंसानों का 37°C) बनाए रखने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए शुद्ध और अशुद्ध रक्त का पूरी तरह अलग रहना अनिवार्य है।

लसीका तंत्र (LYMPHATIC SYSTEM)

  • लसीका (Lymph) या ऊतक तरल: यह भी वहन में सहायता करने वाला एक अन्य तरल है।
  • निर्माण: जब रक्त कूपिकाओं से होकर गुजरता है, तो उनकी पतली दीवारों के छिद्रों से कुछ प्लाज्मा, प्रोटीन और श्वेत रक्त कोशिकाएं बाहर निकलकर कोशिकाओं के बीच के खाली स्थान (Intercellular spaces) में आ जाती हैं। इसी को लसीका कहते हैं।
  • गुण: यह रक्त के प्लाज्मा जैसा ही होता है, लेकिन यह पूरी तरह से रंगहीन (Colorless) होता है और इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है।
  • कार्य: 1. यह छोटी आंत द्वारा अवशोषित वसा (Fat) का शरीर में वहन करता है।
    2. यह बाह्य कोशिकीय अवकाश के अतिरिक्त तरल को वापस समेटकर मुख्य रक्त वाहिकाओं में डालता है।

पौधों में परिवहन (TRANSPORT IN PLANTS)

पौधों में परिवहन के लिए दो पूरी तरह से अलग संवहन मार्ग (Vascular Tissues) होते हैं:

1. जाइलम (Xylem):

  • कार्य: यह जड़ों द्वारा मिट्टी से सोखे गए जल और खनिज लवणों को पौधे के शीर्ष भागों (पत्तियों) तक पहुँचाता है।
  • दिशा: इसका प्रवाह हमेशा एकदिशीय (Unidirectional) यानी केवल नीचे से ऊपर की ओर होता है।
  • बल: यह मुख्य रूप से भौतिक बलों द्वारा काम करता है। पत्तियों से होने वाले वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) के कारण एक चूषण बल (Transpiration Pull) पैदा होता है, जो पानी को ऊंचे पेड़ों में ऊपर खींच लेता है। इसमें पौधे की कोई रासायनिक ऊर्जा (ATP) खर्च नहीं होती।

2. फ्लोएम (Phloem):

  • कार्य: यह पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा तैयार भोजन (सुक्रोज/शर्करा) और अमीनो अम्ल को पौधे के संचय अंगों (जड़ों, फलों, बीजों) तक पहुँचाता है।
  • स्थानांतरण (Translocation): फ्लोएम द्वारा भोजन के इस परिवहन को स्थानांतरण कहते हैं।
  • दिशा: इसका प्रवाह द्विदिशीय (Bidirectional) होता है, यानी भोजन ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में भेजा जा सकता है।
  • ऊर्जा: स्थानांतरण एक सक्रिय प्रक्रिया है। भोजन को फ्लोएम में लोड करने और परिवहन के लिए ATP के रूप में पौधे की ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।

उत्सर्जन तंत्र (EXCRETORY SYSTEM)

जीवों के शरीर में विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप बनने वाले हानिकारक नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया और यूरिक अम्ल) को शरीर से बाहर निकालने की जैविक प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।

मानव उत्सर्जन तंत्र के मुख्य अंग:

  1. एक जोड़ी वृक्क (Kidneys): ये पेट के पिछले हिस्से में रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ सेम के बीज के आकार के दो अंग होते हैं। इनका मुख्य काम रक्त को छानकर मूत्र (Urine) बनाना है।
  2. एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ (Ureters): ये दो नलिकाएं हैं जो प्रत्येक वृक्क से निकलकर मूत्र को नीचे मूत्राशय तक लाती हैं।
  3. एक मूत्राशय (Urinary Bladder): यह एक पेशीय थैली है जहाँ मूत्र को तब तक जमा रखा जाता है जब तक कि वह भर न जाए।
  4. एक मूत्रमार्ग (Urethra): इसके माध्यम से मूत्र को समय-समय पर शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

वृक्काणु / नेफ्रॉन (NEPHRON)

नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख सूक्ष्म नेफ्रॉन होते हैं जो रक्त शोधन का कार्य करते हैं।

मूत्र निर्माण की प्रक्रिया के तीन मुख्य चरण:

  1. गुच्छीय निस्यंदन (Glomerular Filtration): वृक्क धमनी द्वारा लाया गया अशुद्ध रक्त नेफ्रॉन के कप जैसी संरचना बोमन संपुट (Bowman's Capsule) में मौजूद कोशिकाओं के गुच्छ (Glomerulus) में जाता है। यहाँ उच्च दाब के कारण रक्त छनता है। प्रारंभिक छनित (Filtrate) में यूरिया के साथ-साथ ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और बहुत सारा पानी भी छन जाता है।
  2. चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption): जब यह छनित तरल नेफ्रॉन की लंबी कुंडलित नलिका से गुजरता है, तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थ जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, आवश्यक लवण और पर्याप्त पानी को नलिका के चारों ओर लिपटी रक्त वाहिकाएं दोबारा सोख (Reabsorb) लेती हैं।
  3. नलिका स्रवण (Tubular Secretion): अंत में केवल अनुपयोगी अपशिष्ट यूरिया, कुछ अतिरिक्त लवण और पानी ही नलिका में बचते हैं, जो संग्रहक वाहिनी (Collecting Duct) में जाकर मूत्र का रूप ले लेते हैं।

पौधों में उत्सर्जन की रणनीतियाँ

पौधों में उत्सर्जन के लिए कोई विशिष्ट अंग तंत्र नहीं होता। वे इन सरल तरीकों का उपयोग करते हैं:

  • गैसीय अपशिष्ट: प्रकाश संश्लेषण के दौरान बनी अतिरिक्त ऑक्सीजन ($O_{2}$) और श्वसन की कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) को पत्तों के रंध्रों (Stomata) द्वारा सीधे हवा में विसरित (Diffuse) कर दिया जाता है।
  • अतिरिक्त जल: इसे वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की प्रक्रिया द्वारा पत्तियों से भाप बनाकर हवा में उड़ा दिया जाता है।
  • ठोस/तरल अपशिष्ट संचय: पौधे कई अपशिष्ट पदार्थों को अपनी कोशिकाओं की रिक्तिकाओं (Vacuoles) में जमा रखते हैं। वे अपनी पुरानी सूखी पत्तियों, फलों और पेड़ की छाल को समय-समय पर गिराकर इन अपशिष्टों से छुटकारा पा लेते हैं।
  • रेजिन और गोंद (Resins & Gums): ये अपशिष्ट पदार्थ पौधे के तने के पुराने जाइलम (Old Xylem) ऊतकों में जमा हो जाते हैं।
  • मिट्टी में उत्सर्जन: पौधे अपने आस-पास की मिट्टी (Soil) में भी जड़ों द्वारा कुछ अपशिष्ट पदार्थों को सक्रिय रूप से स्रावित करते हैं।

|| अध्याय समाप्त - ऑल द बेस्ट फॉर एग्जाम्स! ||

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